अमेरिका की उच्च सदन 'सीनेट' ने रूस के ऊर्जा क्षेत्र को निशाना बनाते हुए लंबे समय से अटके एक कड़े प्रतिबंध विधेयक (Bill) को भारी बहुमत से पारित कर दिया है। इस विधेयक का सबसे बड़ा और सीधा असर भारत, चीन, जापान और यूरोपीय देशों पर पड़ सकता है। नए नियमों के तहत रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों के उत्पादों पर अमेरिकी राष्ट्रपति 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम आयात शुल्क (Tariff) लगा सकेंगे।
सीनेट में 86-11 के भारी बहुमत से हुआ पारित
रूस पर आर्थिक दबाव बनाने के उद्देश्य से लाए गए इस विधेयक के पक्ष में 86 और विरोध में महज 11 वोट पड़े। दिवंगत रिपब्लिकन सांसद लिंडसे ग्राहम द्वारा पेश किए गए इस बिल का मुख्य मकसद पिछले साढ़े चार वर्षों से जारी यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के लिए मॉस्को को वार्ता की मेज पर लाना है। सीनेट से हरी झंडी मिलने के बाद अब इस विधेयक को मंजूरी के लिए प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) में पेश किया जाएगा। वहां से पारित होने के बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही यह कानून का रूप ले लेगा।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा प्रहार
यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से ही भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से बड़ी मात्रा में रियायती दर पर कच्चा तेल खरीद रहा है। मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक, भारत प्रतिदिन 20 लाख बैरल से भी ज्यादा रूसी तेल का आयात कर रहा है। इसके अलावा, मध्य पूर्व में ईरान से जुड़े तनाव के बाद भारत ने रूस से गैस का आयात भी बढ़ा दिया है।
यदि यह बिल अंतिम रूप से लागू हो जाता है, तो भारत के लिए रूस से सस्ता तेल खरीदना काफी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर 100% टैरिफ लगाने की चेतावनी से भारतीय निर्यात और वैश्विक व्यापारिक संबंधों पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
वैश्विक बाजारों में मचेगी हलचल
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से न केवल भारत और चीन जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुश्किलें बढ़ेंगी, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में भी भारी अनिश्चितता का माहौल बन सकता है। अब पूरी दुनिया की नजरें अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के आगामी रुख पर टिकी हैं।


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