​नई दिल्ली / रियाद:

​पश्चिम एशिया (वेस्ट एशिया) में ईरान से जुड़े युद्ध और बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक राजनीति में एक नया और बड़ा मोड़ आया है। दुनिया के तीन प्रमुख मुस्लिम बहुल देशों—सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की—ने एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे 'मक्का पैक्ट' (Mecca Pact) का नाम दिया गया है।

​इस रक्षा समझौते के तहत यह प्रावधान किया गया है कि यदि इन तीनों में से किसी भी देश पर कोई सशस्त्र सैन्य हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा और तीनों देश मिलकर उसका सामूहिक जवाब देंगे।

​'मक्का पैक्ट': एक ही मंच पर आए तीन शक्तिशाली देश

​यह ऐतिहासिक समझौता सऊदी अरब में आयोजित एक संयुक्त रक्षा शिखर सम्मेलन के दौरान हुआ। इसमें सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ शामिल हुए।

​पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान के अनुसार:

​"यह समझौता तीनों राष्ट्रों के बीच सदियों पुराने ऐतिहासिक संबंधों, इस्लामी एकजुटता और साझा रणनीतिक हितों पर आधारित है। इसका मुख्य उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करना और क्षेत्र में शांति व स्थिरता को बढ़ावा देना है।"

​तुर्की के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह से एक 'रक्षात्मक समझौता' है और इसका उद्देश्य किसी विशेष देश को निशाना बनाना नहीं है। यह मंच क्षेत्र के अन्य देशों के लिए भी खुला रहेगा।

​तीनों देशों की अपनी-अपनी सामरिक ताकत

​यह त्रिपक्षीय गठबंधन इसलिए भी बेहद खास और शक्तिशाली माना जा रहा है क्योंकि तीनों ही देश अपनी अलग-अलग सामरिक क्षमताओं के लिए जाने जाते हैं:

​तुर्की: नाटो (NATO) गठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी और आधुनिक सेना रखता है।

​सऊदी अरब: दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में से एक है और आर्थिक रूप से बेहद संपन्न है।

​पाकिस्तान: मुस्लिम जगत का एकमात्र परमाणु हथियार संपन्न (Nuclear-armed) देश है।

​विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते में तुर्की और पाकिस्तान उन्नत रक्षा विनिर्माण और सैन्य प्रशिक्षण देंगे, जबकि सऊदी अरब इसमें वित्तीय और तकनीकी निवेश प्रदान करेगा।

​भारत की प्रतिक्रिया: "हम घटनाक्रम पर रख रहे हैं पैनी नज़र"

​सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के इस अचानक बने सैन्य गठबंधन पर भारत ने सतर्क रुख अपनाया है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा:

​"तीनों देशों के बीच हुआ यह रक्षा समझौता एक नया घटनाक्रम है। हम इस पर बहुत करीब से नज़र बनाए हुए हैं और स्थिति के अनुसार आगे की जानकारी साझा करते रहेंगे।"

​विश्लेषकों का मानना है कि भारत के लिए यह स्थिति कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत के सऊदी अरब के साथ बहुत मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं, जबकि पाकिस्तान और तुर्की के साथ भारत के रिश्ते रणनीतिक रूप से संवेदनशील रहे हैं। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का ध्यान मुख्यतः भारत की ओर ही केंद्रित रहेगा और इस समझौते में परमाणु घटक शामिल होने की संभावना न के बराबर है।

​ये भी पढ़े➜देहरादून में शर्मनाक वारदात: 7 माह की गर्भवती महिला को पटककर पीटा, देवर पर लाठी-रॉड से हमला; 9 पर FIR

​क्यों पड़ी इस नए रक्षा गठबंधन की जरूरत?

​पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति उस समय बिगड़ गई जब 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद पूरे क्षेत्र में संघर्ष भड़क उठा। सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश लगातार मिसाइल और ड्रोन हमलों तथा ऊर्जा आपूर्ति में बाधाओं का सामना कर रहे हैं।

​ऐसे समय में यह समझौता इन देशों को एक सामूहिक सुरक्षा कवच प्रदान करने और क्षेत्र में अपनी शर्तों पर सुरक्षा ढांचा तैयार करने का एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है।