नई दिल्ली / वाशिंगटन / तेहरान:
पश्चिम एशिया पिछले पांच महीनों से बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है। अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच गहराता संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा। जुलाई के पहले हफ्ते से दोबारा शुरू हुई भीषण गोलाबारी और हमलों के बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक हालिया दावे ने दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
ट्रंप ने संकेत दिया है कि अमेरिका और इस्राइल, ईरान पर हमले रोकने पर सहमत हो गए हैं और दोनों देश एक नए कूटनीतिक समझौते के बेहद करीब हैं। हालाँकि, ईरान ने ट्रंप के इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए इसे एक 'नया झूठ' करार दिया है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में यह भीषण युद्ध अब खत्म होने की कगार पर है, या फिर इसके पीछे कोई और रणनीतिक चाल छिपी है? आइए समझते हैं इस पूरे घटनाक्रम के मुख्य पहलू।
1. ट्रंप का बड़ा दावा: क्यों अचानक थमे अमेरिकी हमले?
डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर घोषणा की कि अमेरिका, ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले की पूरी तैयारी कर चुका था। लेकिन तेहरान और कुछ प्रमुख पश्चिम एशियाई देशों की अपील के बाद उन्होंने इन हमलों को फिलहाल के लिए टाल दिया है।
ट्रंप का कहना है कि भविष्य के समझौते के मुख्य बिंदुओं (Parameters) पर व्यापक सहमति बन चुकी है। उन्होंने शर्त रखी है कि यह सीजफायर तभी स्थायी होगा जब ईरान जल्द से जल्द समझौते पर हस्ताक्षर करेगा। इस फैसले में इस्राइल भी अमेरिका के साथ शामिल बताया जा रहा है। हालांकि, इस प्रस्तावित समझौते की विस्तृत शर्तें और मध्यस्थों की भूमिका अभी तक स्पष्ट नहीं की गई हैं।
2. पर्दे के पीछे की कहानी: ट्रंप के कदम पीछे खींचने के 3 बड़े कारण
विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप के इस फैसले के पीछे केवल कूटनीति नहीं, बल्कि कुछ ठोस रणनीतिक और घरेलू कारण भी हैं:
• सऊदी अरब का सख्त रुख: अमेरिकी मीडिया आउटलेट Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने सीधे ट्रंप से बात की और ईरान के खिलाफ नए और भारी हमलों का कड़ा विरोध जताया। उन्होंने क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए तनाव कम करने का सुझाव दिया।
• हथियारों का घटता जखीरा:सेंटर फॉर स्ट्रैटिजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) की एक स्टडी के अनुसार, महीनों से जारी इस युद्ध के कारण अमेरिका के एयर डिफेंस इंटरसेप्टर्स (जैसे Patriot और THAAD) का भंडार 50% तक कम हो चुका है। इसके अलावा टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों की भी कमी दर्ज की जा रही है, जिससे पेंटागन की चिंताएं बढ़ गई हैं।
• घरेलू राजनीति और गिरती लोकप्रियता:प्यू रिसर्च सेंटर के ताजा सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 60% अमेरिकी नागरिक इस युद्ध के खिलाफ हैं। युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे अमेरिका में महंगाई बढ़ रही है। आने वाले मध्यावधि चुनावों (Midterm Elections) को देखते हुए ट्रंप प्रशासन पर युद्ध रोकने का भारी दबाव है।
3. ईरान का पलटवार: "हमनी गिड़गिड़ाए नहीं, ट्रंप खुद पीछे हटे"
ट्रंप के इन दावों पर ईरान की प्रतिक्रिया बेहद सख्त और आक्रामक रही है:
• झूठ का आरोप: ईरानी सैन्य अधिकारियों और सरकारी मीडिया ने ट्रंप के दावों को खारिज करते हुए कहा कि तेहरान ने हमले रोकने की कोई गुहार नहीं लगाई। ईरान का आरोप है कि ट्रंप खाड़ी देशों पर दबाव बनाने और उनसे राजनीतिक लाभ लेने के लिए ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं।
• होर्मुज जलडमरूमध्य पर अडिग रुख: ट्रंप ने दावा किया था कि नए समझौते के तहत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Hormuz Strait) को अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए पूरी तरह से खोल दिया जाएगा। लेकिन ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि यह जलमार्ग अब युद्ध-पूर्व स्थिति में कभी वापस नहीं लौटेगा और वे केवल ओमान के साथ मिलकर ही इसका प्रबंधन करेंगे।
• तेल क्षेत्रों को राख बनाने की चेतावनी: ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची और कार्यवाहक रक्षा मंत्री माजिद इब्न अल-रेजा ने चेतावनी दी है कि ईरानी सेना हाई अलर्ट पर है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि अमेरिका या उसके सहयोगियों ने ईरान के ऊर्जा ढांचागत संसाधनों पर हमला किया, तो जवाब में सऊदी अरब, यूएई, कतर और इस्राइल के तेल व गैस क्षेत्र राख में बदल दिए जाएंगे।
4. क्या पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता रंग लाएगी?
भले ही सार्वजनिक रूप से दोनों देश एक-दूसरे पर हमलावर हों, लेकिन पर्दे के पीछे कूटनीतिक प्रयास जारी हैं। कतर, पाकिस्तान, तुर्किये और यूएई जैसे देश लगातार दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं।
पाकिस्तानी और कतरी वार्ताकारों ने उम्मीद जताई है कि रुकी हुई बातचीत में जल्द ही कोई सकारात्मक प्रगति देखने को मिल सकती है। ट्रंप प्रशासन के मुख्य वार्ताकार—जेरेड कुशनर, स्टीव विटकॉफ और मार्को रुबियो—भी बैकचैनल कूटनीति के जरिए किसी नतीजे पर पहुंचने की कोशिशों में लगे हैं।
निष्कर्ष: शांति का नया सवेरा या सिर्फ युद्ध में विराम?
मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो रॉस हैरिसन के अनुसार, जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी हटाने और अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर कोई पारदर्शी समझौता नहीं हो जाता, तब तक ट्रंप का यह ऐलान किसी ठोस शांति समझौते से ज्यादा "युद्ध में केवल एक अस्थायी रोक" है।
पश्चिम एशिया में जारी यह तनाव अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि दुनिया एक नए शांति समझौते की साक्षी बनेगी या फिर यह खामोशी किसी और बड़े सैन्य विस्फोट का तूफान लेकर आएगी।
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